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किसानों की आय

जानिए हरे चारे की समस्या को दूर करने वाली ग्रीष्मकालीन फसलों के बारे में

जानिए हरे चारे की समस्या को दूर करने वाली ग्रीष्मकालीन फसलों के बारे में

पशुपालकों को हरा चारा सुनिश्चित करने के लिए काफी अधिक परिश्रम करना पड़ सकता है। भारतीय मौसम विगाग का कहना है, कि इस बार गर्मी अपने चरम स्तर पर पहुँचने की आशंका है। 

विगत दिनों तापमान में सामान्य से अधिक वृद्धि होने की वजह से पशुपालकों के हरे चारे की उपलब्धता में गिरावट आ रही है। क्योंकि, तापमान में वृद्धि होने के कारण खेतों में नमी की मात्रा में गिरावट देखने को मिल रही है। 

हरे चारे पर इसका प्रत्यक्ष तौर प्रभाव देखने को मिल रहा है। इस वजह से पशुपालकों को वक्त रहते ही हरे चारे की व्यवस्था सुनिश्चित कर लेनी चाहिए, जिससे आगामी समय में पशु को पर्याप्त चारा हांसिल हो सके। 

क्योंकि, हरे चारे के अभाव का सीधा प्रभाव पशुओं के दुग्ध उत्पादन क्षमता पर पड़ता है। नतीजतन, पशुपालकों की कमाई में गिरावट आने लगती है। 

हरे चारे की किल्लत को दूर करने वाली फसलें इस प्रकार हैं ?

आप सब ने लोबिया, मक्का और ज्वार  का नाम तो सुना ही होगा। लेकिन, क्या आप जानते हैं, कि लोबिया, मक्का और ज्वार का चारा पशुओं के लिए बेहद लाभकारी होता है। 

इसके अतिरिक्त मक्का, ज्वार और लोबिया फसल लगाने से किसान हरे चारे की किल्लत से छुटकारा पा सकते हैं। क्योंकि, यह एक तीव्रता से बढ़ने वाले हरे चारे वाली फसलें हैं। 

इसके अतिरिक्त इन चारों के साथ सबसे खास बात यह है, कि इनकी खेती करने से खेत की उर्वरक क्षमता को भी प्रोत्साहन मिलता है, जिससे किसान अगली फसल में मुनाफा उठा सकते हैं। वहीं, इसके प्रतिदिन सेवन से पशुओं की दुग्ध उत्पादन क्षमता में भी इजाफा होता है।

मक्का 

पशुओं के लिए पशुपालक हरा चारा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से मक्के की संकर मक्का गंगा-2, गंगा-7, विजय कम्पोजिट जे 1006 अफ्रीकन टॉल, प्रताप चारा-6 आदि जैसी प्रमुख मक्का की उन्नत किस्मों की खेती कर सकते हैं।

ज्वार

गर्मी के मौसम में पशुओं के लिए हरे चारे की किल्लत को दूर करने के लिए ज्वार की पूसा चरी 23, पूसा हाइब्रिड चरी-109, पूसा चरी 615, पूसा चरी 6, पूसा चरी 9, पूसा शंकर- 6, एस. एस. जी. 59-3 (मीठी सूडान), एम.पी. चरी, एस.एस. जी.-988-898, एस. एस. जी. 59-3, • जे.सी. 69. सी. एस. एच. 20 एमजी, हरियाणा ज्वार- 513 जैसी विशेष किस्मों की खेती कर सकते हैं। 

लोबिया 

लोबिया एक वार्षिक जड़ी-बूटी वाली फलियां हैं, जिसकी खेती बीजों अथवा चारे के लिए की जाती है। इसकी पत्तियाँ अंडाकार पत्तों वाली त्रिकोणीय होती हैं, जो 6-15 सेमी लंबी और 4-11 सेमी चौड़ाई वाली होती हैं। 

लोबिया के फूल सफेद, पीले, हल्के नीले या बैंगनी रंग के होते हैं। इसकी फली जोड़े में पाई जाती हैं। इसकी प्रति फली में 8 से 20 बीज होते हैं। इसके साथ ही बीज सफेद, गुलाबी, भूरा या काला होता है।

Mungfali Ki Kheti: मूंगफली की खेती से संबंधित विस्तृत जानकारी

Mungfali Ki Kheti: मूंगफली की खेती से संबंधित विस्तृत जानकारी

आज हम आपको इस लेख में मूंगफली की खेती के बारे में विस्तृत जानकारी देने वाले हैं। परंपरागत फसलों के तुलनात्मक मूंगफली को ज्यादा मुनाफा देने वाली फसल माना जाता है। यदि किसान मूंगफली की खेती वैज्ञानिक ढंग से करते हैं, तो वह इस फसल से ज्यादा उत्पादन उठाकर बेहतरीन मुनाफा कमा सकते हैं। बतादें, कि खरीफ सीजन के फसल चक्र में मूंगफली की खेती का नाम सर्वप्रथम आता है। भारत के कर्नाटक,आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र में प्रमुख तौर पर मूंगफली की खेती की जाती है। 

मूंगफली की खेती

यदि आप मूंगफली का उत्पादन करके बेहतरीन पैदावार से ज्यादा मुनाफा अर्जित करना चाहते हैं, तो मूंगफली की खेती कब और कैसे करनी चाहिए,
मूंगफली की बुवाई का समुचित समय क्या है? मूंगफली की उन्नत किस्म कौन सी है? मूंगफली हेतु बेहतर खाद व उर्वरक आदि से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारी आपको होनी ही चाहिए। तब ही आप मूंगफली की उन्नत खेती कर सकेंगे। मूंगफली की उन्नत खेती करने के इच्छुक किसानों को इस लेख को आखिर तक अवश्य होंगे। 

मूंगफली की खेती किस इलाके में की जाती है

मूंगफली को तिलहनी फसलों की श्रेणी में रखा गया है, जो ऊष्णकटबंधीय इलाकों में बड़ी ही सुगमता से उत्पादित की जा सकती हैं। जो किसान मूंगफली की खेती करने की योजना बना रहे हैं, उनको इस लेख को ध्यानपूर्वक पूरा पढ़ना चाहिए। इस लेख में किसानों को मूंगफली की उन्नत खेती किस प्रकार करें? इस विषय में विस्तृत रूप से जानकारी दी जाएगी। 

मूंगफली की खेती के लिए सबसे उपयुक्त जलवायु कौन-सी है

मूंगफली की खेती करने के लिए अर्ध-उष्ण जलवायु सबसे बेहतर मानी जाती है। इसकी खेती से बेहतरीन उत्पादन पाने के लिए 25 से 30 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान की जरुरत होती है। मूंगफली फसल के लिए 50 से 100 सेंटीमीटर बारिश सर्वोत्तम मानी जाती है।

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मूंगफली की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी

मूंगफली की खेती विभिन्न प्रकार की मृदा में की जा सकती है। परंतु, मूंगफली की फसल से बेहतरीन पैदावार लेने के लिए बेहतरीन जल निकासी और कैल्शियम एवं जैव पदार्थो से युक्त बलुई दोमट मृदा सबसे उपयुक्त मानी गई है। इसकी खेती के लिए मृदा पीएच मानक 6 से 7 के मध्य होना आवश्यक है। 

मूंगफली फसल के लिए खेत की तैयारी

मूंगफली की खेती के लिए प्रथम जुताई मृदा पलटने वाले हल कर खेत को कुछ दिनों के लिए खुला छोड़ दें। जिससे कि उसमें उपस्थित पुराने अवशेषों, खरपतवार एवं कीटों का खत्मा हो जाये। खेत की आखिरी जुताई करके मृदा को भुरभुरी बनाकर खेत को पाटा लगाकर समतल कर लें। खेत की अंतिम जुताई के दौरान 120 कि.ग्रा./एकड़ जिप्सम/फास्फोजिप्सम उपयोग करें। दीमक एवं अन्य कीड़ों से संरक्षण के लिए किनलफोस 25 किग्रा एवं निम की खली 400 किग्रा प्रति हैक्टेयर खेत में डालें। 

भारत के अंदर मूंगफली की खेती के लिए विभिन्न किस्में मौजूद हैं, जो कि निम्नलिखित हैं।

फैलने वाली वैरायटी:- आर जी-382 (दुर्गा), एम-13, एम ए-10, आर एस-1 और एम-335, चित्रा इत्यादि। 

मध्यम फैलने वाली वैरायटी:- आर जी-425, गिरनार-2, आर एस बी-87, एच एन जी-10 और आर जी-138, इत्यादि।

झुमका वैरायटी:- ए के-12 व 24, टी जी-37ए, आर जी-141, डी ए जी-24, जी जी-2 और जे एल-24 इत्यादि। 

मूंगफली के बीज की क्या दर होनी चाहिए

मूंगफली की गुच्छेदार प्रजातियों के लिए 100 कि.ग्रा. और फैलने वाली प्रजातियों के लिए 80 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टेयर की दर से जरुरी होता है।  

मूंगफली के बीज को किस प्रकार उपचारित किया जाए

मूंगफली के बीज का समुचित ढंग से अंकुरण करने के लिए बीज को उपचारित अवश्य कर लें। कार्बोक्सिन 37.5% + थाइरम 37.5 % की 2.5 ग्राम/कि.ग्रा. बीज की दर से या 1 ग्रा. कार्बेन्डाजिम + ट्राइकाडर्मा विरिडी 4 ग्रा./कि.ग्रा. के अनुरूप बीज को उपचारित किया जाए। 

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मूंगफली की बुआई किस प्रकार से की जाए

मूंगफली की बुवाई के लिए सबसे अच्छा समय जून के द्वितीय सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह में की जा सकती है। मूंगफली का बीजारोपण रेज्ड बेड विधि द्वारा करना चाहिए। इस विधि के अनुरूप बुवाई करने पर 5 कतारों के उपरांत एक-एक कतार खाली छोड़ते हैं। झुमका किस्म:- झुमका वैरायटी के लिए कतार से कतार का फासला 30 से.मी. एवं पौधे से पौधे की फासला 10 से.मी. आवश्यक होता है। विस्तार किस्मों के लिए:- विस्तार किस्मों के लिए कतार से कतार का फासला 45 से.मी. वहीं पौधे से पौधे का फासला 15 सें.मी. रखें। बीज को 3 से 5 से.मी. की गहराई में ही बोयें। 

मूंगफली की खेती में खरपतवार नियंत्रण

मूंगफली फसल में सत्यानाशी, कोकावा, दूधघास, मोथा, लकासा, जंगली चौलाइ, बनचरी, हिरनखुरी, कोकावा और गोखरू आदि खरपतवार प्रमुख रूप से उग जाते हैं। इनकी रोकथाम करने के लिए 30 और 45 दिन पर निदाई-गुड़ाई करें, जिससे कि खरपतवार नियंत्रण मूंगफली की जड़ों का फैलाव अच्छा होने के साथ मृदा के अंदर वायु का संचार भी हो जाता है। 

मूंगफली की खेती के लिए सिंचाई प्रबंधन

जायद की फसल के लिए सिचाई – बतादें कि प्रथम सिंचाई बुवाई के 10-15 दिन उपरांत, दूसरी सिंचाई बुवाई के 30-35 दिन के उपरांत एवं तीसरी फूल एवं सुई निर्माण के वक्त, चौथी सिचाई 50-75 दिन उपरांत मतलब फली बनने के समय तो वहीं पांचवी सिचाई फलियों की प्रगति के दौरान (75-90 दिन बाद) करनी जरूरी होती है। यदि मूंगफली की बुवाई वर्षाकाल में करी है, तब वर्षा के आधार पर सिंचाई की जाए। 

मूंगफली की फसल में लगने वाले कीट

रस चूसक/ पत्ती सुरंगक/ चेपा/ टिक्का/ रोजेट/फुदका/ थ्रिप्स/ दीमक/सफेद लट/बिहार रोमिल इल्ली और मूंगफली का माहू इत्यादि इसकी फसल में विशेष तौर पर लगने वाले कीट और रोग हैं। 

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मूंगफली की खुदाई हेतु सबसे अच्छा समय कौन-सा होता है

आपकी जानकारी के लिए बतादें कि मूंगफली के पौधों की पत्तियों का रंग पीला होने लग जाए। फलियों के अंदर के टेनिन का रंग उड़ जाए और बीज का खोल रंगीन हो जाने के उपरांत खुदाई करें। खुदाई के दौरान खेत में हल्की नमी होनी चाहिए। बतादें, कि भंडारण और अंकुरण क्षमता स्थिर बनाये रखने के लिए खुदाई के उपरांत सावधानीपूर्वक मूंगफली को सुखाना चाहिए। मूंगफली का भंडारण करने से पूर्व यह जाँच कर लें कि मूंगफली के दानो में नमी की मात्रा 8 से 10% प्रतिशत से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। 

मूंगफली की खेती में कितना खर्च और कितनी आय होती है

मूंगफली की खेती को बेहतरीन पैदावार देने वाली फसल मानी जाती है। इसकी खेती करने में लगभग 1-2 लाख रुपए तक की लागात आ जाती है। यदि किसानों के हित में सभी कुछ ठीक रहा तो प्रति हेक्टेयर तकरीबन 5-6 लाख की आमदनी की जा सकती है।

इस तरह करें अगेती आलू की खेती

इस तरह करें अगेती आलू की खेती

आज हम आपको जानकारी देने जा रहे है सब्जियों के "राजा साहब" आलू की. आलू एक ऐसी सब्जी है जो की किसी भी सब्जी के साथ मिल जाती है, आलू के व्यंजन भी बनाते है जिनकी गिनती करने लगो तो समय कम पड़ जाये. क्षेत्र के हिसाब से इसके भांति भांति के व्यंजन बनते हैं सब्जी के साथ साथ आलू की भुजिआ , नमकीन , जिप्स, टिक्की, पापड़, पकोड़े, हलुआ आदि. आलू एक ऐसी सब्जी है जब घर में कोई सब्जी न हो तो भी अकेले आलू की सब्जी या चटनी बनाई जा सकती है. सबसे खास बात ये किसान के लिए सबसे बर्वादी वाली फसल है और सबसे ज्यादा आमदनी वाली फसल भी है. सामान्यतः किसानों में एक कहावत प्रचलित है की आलू के घाटे को आलू ही पूरा कर सकता है. इससे इसकी अहमियत पता चलती है.

खेत की तैयारी:

किसी भी जमीन के अंदर वाली फसल के लिए खेत की मिटटी भुरभुरी होनी चाहिए जिससे की फसल को पनपने के लिए पर्याप्त जगह मिल सके, क्योकि किसी ठोस या कड़क मिटटी में वो पनप नहीं पायेगी. हमेशा आलू के खेत की मिटटी को इतना भुरभरा बना दिया जाता है की इसमें से कोई भी आदमी दौड़ के पार न कर सके. इसका मतलब इसको बहुत ही गहराई के साथ जुताई की जाती है. अभी का समय आलू के खेत को तैयार करने का सही समय है. सबसे पहले हमको खेत में बनी हुई
गोबर की खाद दाल देनी चाहिए और खाद की मात्रा इतनी होनी चाहिए जिससे की खेत की मिटटी का रंग बदल जाये, कहने का तात्पर्य है की अगर हमें 100 किलो खाद की जरूरत है तो हमें इसमें 150 किलो खाद डालना चाहिए इससे हमें रासायनिक खाद पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और हमारा आलू भी अच्छी क्वालिटी का पैदा होगा.

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आलू की बुबाई से पहले खेत में जिंक आदि मिलाने की सोच रहे हैं तो पहले मिटटी की जाँच कराएं उसके बाद जरूरत के हिसाब से ही जिंक या पोटाश मिलाएं. ऐसा न करें की आपका पडोसी क्या लाया है वही आप भी जाकर खरीद लाएं किसी भी दुकानदार के वाहकावें में न आएं. आप जो भी पैसा खर्च करतें है वो आपकी खून पसीने की कमाई होती है. किसी को ऐसे ही न लुटाएं.

अगेती आलू की खेती का समय:

अगेती आलू की खेती का समय क्षेत्र के हिसाब से अलग अलग होता है. इसको लगाने के समय मौसम के हिसाब से होता है. इसको विकसित होने के लिए हलकी ठण्ड की आवश्यकता होती है. अगर हम उत्तर भारत की बात करें तो ध्यान रहे की इसकी फसल दिसंबर तक पूरी हो जानी  चाहिए. इसकी बुवाई लगभग सितम्बर/अक्टूबर में शुरू हो जाती है. आलू दो तरह का बोया जाता है एक फसल इसकी कोल्ड स्टोरेज में रखी जाती है उसकी खुदाई फरबरी और मार्च में होती है और जो कच्ची फसल होती है उसको स्टोर नहीं किया जा सकता उसकी खुदाई दिसंबर में हो जाती है. सितम्बर से कच्चा आलू देश के अन्य हिस्सों से आना शुरू हो जाता है.

जमीन और मौसम:

आलू के लिए दोमट और रेतीली मिटटी ज्यादा मुफीद होती है, याद रखें की पानी निकासी की समुचित व्यवस्था होनी चाहिए जिससे की आलू के झोरा के ऊपर पानी न जा पाए. आलू में पानी भी कम देना होता है जिससे की उसके आस पास की मिटटी गीली न हो बस उसको नीचे से नमी मिलती रहे. जिससे की आलू को फूलने में कोई भी अवरोध न आये. आलू पर पानी जाने से उसके ऊपर दाग आने की संभावना रहती है, तो  आलू में ज्यादा पानी देने से बचना चाहिए.

अगेती आलू की खेती के बीज का चुनाव:

  • किसी भी फसल के लिए उसके बीज का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण होता है. आलू में कई तरह के बीज आते हैं इसकी हम आगे बात करेंगें.आलू के बीज के लिए कोशिश करें की नया बीज और रोगमुक्त बीज प्रयोग में लाएं. इससे आपके फसल की पैदावार के साथ साथ आपकी पूरे साल की मेहनत और मेहनत की कमाई दोनों ही दाव पर लगे होते हैं.
  • कई बार आलू के बीज की प्रजाति उसके क्षेत्र के हिसाब से भी बोई जाती है. इसके लिए अपने ब्लॉक के कृषि अधिकारी से संपर्क किया जा सकता है या जो फसल अच्छी पैदावार देती है उसका भी प्रयोग कर सकते हैं. ज्यादा जानकारी के लिए आप हमें लिख सकते हैं.
  • आलू का बीज लेते समय ध्यान रखें रोगमुक्त और बड़ा साइज वाला आलू प्रयोग करें, लेकिन ध्यान रहे की बीज इतना भी महगा न हो की आपकी लागत में वृद्धि कर दे. ज्यादातर देखा गया है की छोटे बीज में ही रोग आने की संभावना ज्यादा होती है.


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बुवाई का तरीका:

वैसे तो आजकल आलू बुबाई की अतिआधुनिक मशीनें आ गई है लेकिन बुवाई करते समय ध्यान रखना चाहिए की लाइन में पौधे से पौधे की दूरी 20 से 25 सेंटीमीटर होनी चाहिए और झोरा से झोरा की दूरी 50 सेंटीमीटर होनी चाहिए. इससे से पौधे को भरपूर रौशनी मिलती है और उसे फैलाने और फूलने के लिए पर्याप्त रोशनी और हवा मिलती है. पास पास पौधे होने से आलू का साइज छोटा रहता है तथा इसमें रोग आने की संभावना भी ज्यादा होती है. [video width="640" height="352" mp4="https://www.merikheti.com/assets/post_images/m-2020-08-aloo-1.mp4" autoplay="true" preload="auto"][/video]

खाद का प्रयोग:

  • जैसा की हम पहले बता चुके हैं की आलू के खेत में बानी हुई गोबर की खाद डालनी चाहिए इससे रासायनिक खादों से बचा जा सकता है.
  • पोटाश 50 से 75 किलो और जिंक ७.५  पर एकड़ दोनों को मिक्स कर लें और 50 किलो पर एकड़ यूरिया मिला के खेत में बखेर दें, और DAP खाद 200 किलो एकड़ खेत में डाल के ( जिंक और DAP को न मिलाएं) ऊपर से कल्टिवेटर से जुताई करके पटेला/साहेल/सुहागा लगा दें.उसके बाद आलू की बुबाई कर सकते है. इसके 25 दिन बाद हलकी सिचाईं करें उसके बाद यूरिआ 50 से 75 किलो पर एकड और 10 किलो पर एकड़  जाइम मिला कर बखेर दें. पहले पानी के बाद फपूँदी नाशक का स्प्रे करा दें.

मौसम से बचाव:

इसको पाले से पानी के द्वारा ही बचाया जा सकता है. जब भी रात को पाला पड़े तो दिन में आपको पानी लगाना पड़ेगा. ज्यादा नुकसान होने पर 5 से 7 किलो पर एकड़ सल्फर बखेर दें जिससे जाड़े का प्रकोप काम होगा.

आलू की प्रजाति:

3797, चिप्सोना, कुफऱी चंदरमुखी, कुफरी अलंकार, कुफरी पुखराज, कुफरी ख्याती, कुफरी सूर्या, कुफरी अशोका, कुफरी जवाहर, जिनकी पकने की अवधि 80 से 100 दिन है
सतावर की खेती से बदली तकदीर

सतावर की खेती से बदली तकदीर

उत्तर प्रदेश के कासगंज में जन्मे श्याम चरण उपाध्याय अच्छी खासी नौकरी छोड़कर किसान बन गए। किसानी यूंतो कांटों भरी डगर ही होती है लेकिन उन्होंने इसके लिए कांटों वाली सतावर की खेती को ही चुना। सीमैप लखनऊ से प्रशिक्षण प्राप्त कर उन्होंने एक दशक पूर्व खेती शुरू की और पहले ही साल एक एकड़ की सतावर को पांच लाख में बेच दिया। उनकी शुरूआत और जानकारी ठीक ठाक होने के कारण वह सफलता की सीढिंयां चढ़ते गए। आज वह एक सैकड़ा किसानों के लिए मार्ग दर्शक का काम कर रहे हैं। उन्होंने एक फार्मर प्रोड्यूशर कंपनी बनाई है। मेडी एरोमा एग्रो प्रोड्यूसर कंपनी प्राईवेट लिमिटेड नामक इस किसान कंपनी में 517 सदस्य हैं। विषमुक्त खेती, रोग मुक्त जीवन के मंत्र पर काम करने वाले उपाध्याय आज अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। कासंगज की पटियाली तहसील के बहोरा गांव में जन्मे श्याम चरण उपाध्याय रीसेंट इंश्योरेंस कंपनी में एक्जीक्यूटिव आफीसर थे। उन्हें वेतन भी 50 हजार के पार मिलता था लेकिन उनकी आत्मा गांव में बसी थी। वह नौकरी के दौरान भी गांव से अपना मोह नहीं छोड़ पाए। उन्होंने यहां  2007 तक काम किया। इसके बाद नौकरी छोड़कर गांव चले आए। गांव आकर उन्होंने खेती में कुछ लीक से हटकर करने का मन बनाया। उन्होंने परंपरागत खेती के अलावा कुछ नया करने की धुन को साकार करने की दिशा में काम शुरू कर दिया। इस काम में उनकी मदद उनकी शिक्षा बायो से बीएससी एवं बाराबंकी के जेपी श्रीवास्तव ने की। वह ओषधीय पौधों की खेती का गुड़ा भाग लगाकर मन पक्का कर चुके थे। सगंधीय पौध संस्थान, सीमैप लखनउू से प्रशिक्षण प्राप्त कर वक काम में जुट गए।

क्या है सतावर की खेती का गणित

श्री उपाध्याय ने बाताया कि एक एकड में सतावर के 11 हजार पौधे लगते हैं। हर पौधे में गीली जड़ दो से पांच किलोग्राम निकलती है। सूखने के बाद यह न्यूनतम 15 प्रतिशत बजनी रहने पर भी 300 ग्राम प्रति पौधे के हिसाब से बैठ जाती है। उनकी एक एकड़ जमीन में उन्हें करीब 30 कुंतल सूखी सतावर प्राप्त हुई। सतावर की कीमत 200 से 500 रुपए प्रति किलोग्राम तक बिक जाती है। उन्होंने पहले साल अपनी पूूरी फसल एक औषधीय फसलों की खरीद करने वाले को पांच लाख में बेच दी। खुदाई से लेकर प्रोसेसिंग का सारा जिम्मा उन्हीं का था।

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किसान इस औषधीय फसल से कम समय में अधिक लाभ उठा सकते हैं
इसके बाद उन्होंने खस बटीवर, पामारोजा, सतावर, स्टीविया, अश्वगंधा, केमोमाइल, लेमनग्रास आदि की खेती कर रहे हैं। किसी भी औषधीय फसल को लगाने से पूर्व वह बाजार की मांग का विशेष ध्यान रखते हैं। बाजार में जिन चीजों की मांग ठीक ठाक हो उन्हें ही वह प्राथमिकता से लगाते हैं।  अब वह कृषक शसक्तीकरण परियोजना में अन्य किसानों को जोड रहे हैं। बंजर में चमन खिलाएंगे श्री उपाध्याय का सपना है कि धान-गेहूं फसल चक्र के चलते जमीन खराब हो रही है। बंजर होते खेतों से भी वह किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में काम कर रहे हैं। बंजर में खस अच्छी लगती है। वह किसानों को खस की खेती करना सिखा रहे हैं। इससे उनकी आय होगी। साथ ही खेती की जमीन भी धीरे धीरे सुधर जाएगी। वह बताते हैं कि ज्यातार किसान जिस खेती को करते हैं उससे अच्छी आय नहीं हो सकता। इस लिए किसानों को लीक से हटकर नई खेती को अपनाना चाहिए। पहली बार में इसे ज्यादा न करें। बाजार आदि की पूरी जानकारी होने के बाद ही काम को धीरे धीरे बढ़ाएं।
सेहत के साथ किसानों की आय भी बढ़ा रही रागी की फसल

सेहत के साथ किसानों की आय भी बढ़ा रही रागी की फसल

छत्तीसगढ़ सरकार खरीद रही समर्थन मूल्य पर

आज हम आपको एक ऐसे पोषण तत्व के बारे में बताने जा रहे हैं जिसके बारे में शायद आपने बहुत कम सुना होगा, या यह भी हो सकता है कि इसके बार में अभी तक आपको कोई जानकारी ही न हो। जिसमें ऐसे कई पोषण तत्व मौजूद हैं जो आपके शरीर के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकते हैं। इसमें कैल्शियम, विटामिन्स, फाइबर, कार्बोहाइड्रेड सरीखे तमाम जरूरी पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मौजूद हैं। जी हां हम बात कर रहे हैं रागी (Ragi or Raagi or Finger millet) की। रागी को बाजरा, फिंगर या नचनी के नाम से भी जाना जाता है। रागी मुख्य रूप से अफ्रीका और एशिया महाद्वीप में उगाई जाती है। जिसको मडुआ, अफ्रीकन रागी, फिंगर बाजरा और लाल बाजरा के नाम से भी जाना जाता है। इसके पौधे पूरे साल पैदावार देने में सक्षम होते हैं। इसके पौधे सामान्य तौर पर एक से डेढ़ मीटर तक की ऊंचाई के पाए जाते हैं। फाइबर से भरपूर होने की वजह से ये शुगर ठीक करने और वजन घटाने में भी मदद करता है। यही नहीं यह तनाव दूर करने में काफी कारगार साबित होता है। आम तौर पर इसे पीसकर या अंकुरित अवस्था में खाते हैं। आप रागी का सेवन रोटी के तौर पर कर सकते हैं। आप इसे गेंहू के आटा के साथ मिलाएं और फिर इसकी रोटी बनाकर खाएं। इसकी इडली भी बनाई जा सकती है। अगर इसका रेगुलर सेवन किया जाए तो यह शरीर में खून की कमी को भी पूरा करता है।


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छतीसगढ़ सरकार कर रही समर्थन मूल्य पर खरीदी

छत्तीसगढ़ को वैसे तो धान का कटोरा कहा जाता है पर अब सरकार किसानों को अन्य फसलों के लिए भी प्रोत्साहित कर रही है,जिससे वे अधिक से अधिक लाभ कमा सकें। छत्तीसगढ़ के कई क्षेत्रों में अब धान के अलावा रागी की फसल भी उगाई जा रही है। वहीं रागी की फसल को प्रोत्साहित करने और किसानों को अधिक पैदावार के लिए प्रोत्साहित करने के लिए, छत्तीसगढ़ सरकार ने पिछले साल से किसानों से रागी की समर्थन मूल्य पर खरीदी भी शुरू कर दी है। पहले किसानों को इस फसल को उगाने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी, पर अब किसान भी धीरे-धीरे इसकी फसल लगाने में अधिक रूचि लेने लगे हैं।


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खेती-किसानी में जुड़ा नया आयाम

छत्तीसगढ़ में धान के अलावा रागी की फसल की समर्थन मूल्य पर खरीदी करने से प्रदेश में खेती- किसानी में एक नया आयाम भी जुड़ गया है। जहां पहले किसान धान की फसल से समृद्ध हो रहे थे अब रागी भी उनकी समृद्धि बढ़ाने में एक कारगार साबित हो रही है।

मिलावट की संभावना नहीं

आज आधुनिक युग में हर ज्यादातर वस्तुओं में मिलावट की खबरें आए दिन सामने आती रहती हैं। त्यौहार हो या सामान्य दिन लोगों को अक्सर मिलावटी खाद्य पदार्थों से दो-चार होना ही पड़ता है, जिसका सीधा असर हमारी सेहत पर पड़ता है। वहीं बच्चे इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होते है क्यों के उनकी इम्युनिटी पावर कम होने के कारण उनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम होती है, जिस कारण उनमें बीमारियों का खतरा अधिक रहता है। पर रागी के मामले में ऐसा नहीं है। रागी में मिलावट की कोई गुंजाइश नहीं है। क्यों के रागी के दाने बहुत ही छोटे होते हैं, इसलिए इसे पॉलिश या प्रोसेस करने की संभावना नहीं होती। जिस वजह से इसमें मिलावट की भी संभावना नहीं रहती है। ऐसे में निरोगी रहने के लिए रागी का सेवन जरूर करें।


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रागी में कैल्शियम की भरपूर मात्र

आज देखा जाए तो लोगों को केल्सियम की कमी से कई बीमारियां हो रही है, जिस कारण उनकी दिनचर्या कफी प्रभावित होती जा रही है। ऐसे में उन लोगों के लिए केल्सियम की कमी को दूर करने के लिए रागी एक कारगार माध्यम साबित हो सकता है। किसी भी अनाज से तुलना की जाए तो रागी के आटे में कैल्शियम सबसे अधिक पाया जाता है। यह एकमात्र ऐसा नॉन-डेयरी प्रोडक्टक्स है जिसमें में इतनी मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है जिस वजह से अगर आप हड्डी की समस्या से जूझ रहे हैं तो इसके नियमित उपयोग से आप अपनी हड्डियों और दांतों को मजबूत बना सकते हैं. इसके अलावा ऑस्टियोपोरोसिस की रोकथाम में भी यह बहुत ही उपयोगी है.

- डायबिटीज़ भी कंट्रोल में रखती है रागी

अनियमित खानपान और प्रभावित होती दिनचर्या के कारण आज पूरे विश्व में डायबिटीज की बीमारी एक मुख्य समस्या के रूप में उभर कर सामने आ रही है। हर घर में एक व्यक्ति इस बीमारी से जूझ रहा है और इस बीमारी से छुटकारा पाने हर महीने रुपए खर्च कर रहा है, फिर भी समस्या जस की जस बनी हुई है। ऐसे में रागी आपको डायबिटीज से बचाने में काफी कारगर सिद्ध हो सकती है। रागी में चावल, मक्का या गेहूं की तुलना में हाई पॉलीफेनोल और डायटरी फाइबर भरपूर मात्रा में मिलता है जिससे आप ग्लूकोज को नियंत्रित रख सकते हैं. इसे आप ब्रेकफास्ट से लेकर लंच या डिनर में भी खा सकते हैं।

सर्दियों में बीमारी से बचाने में कारगार

हर साल सर्दियों का मौसम आते ही सर्दी-खांसी, गले में खराश होना और अधिक ठंड की वजह से कोल्ड स्ट्रोक का खतरा होता है। ऐसे में रागी आपको इन सबसे बचाने में काफी अहम भूमिका निभा सकती है। सर्दियों में लोग अपनी डाइट में कई तरह के फूड्स को शामिल करते हैं, जो शरीर को गर्म रख सकें. ऐसी ही खाद्य सामग्रियों में से एक है रागी। कैल्शियम से भरपूर सर्दियों में इस्तेमाल में लाया जाने वाला रागी का आटा किसी भी अन्य अनाज की तुलना में कैल्शियम से भरपूर होता है।
सही लागत-उत्पादन अनुपात को समझ सब्ज़ी उगाकर कैसे कमाएँ अच्छा मुनाफ़ा, जानें बचत करने की पूरी प्रक्रिया

सही लागत-उत्पादन अनुपात को समझ सब्ज़ी उगाकर कैसे कमाएँ अच्छा मुनाफ़ा, जानें बचत करने की पूरी प्रक्रिया

सही लागत-उत्पादन अनुपात के अनुसार सब्ज़ी की खेती

भारत शुरुआत से ही एक कृषि प्रधान देश माना जाता है और यहां पर रहने वाली अधिकतर जनसंख्या का कृषि ही एक प्राथमिक आय का स्रोत है। पिछले कुछ सालों से बढ़ती जनसंख्या की वजह से बाजार में कृषि उत्पादों की बढ़ी हुई मांग, अब किसानों को जमीन पर अधिक दबाव डालने के लिए मजबूर कर रही है। इसी वजह से कृषि की उपज कम हो रही है, जिसे और बढ़ाने के लिए किसान लागत में बढ़ोतरी कर रहें है। यह पूरी पूरी चक्रीय प्रक्रिया आने वाले समय में किसानों के लिए और अधिक आर्थिक दबाव उपलब्ध करवा सकती है। भारत सरकार के किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य पर अब कृषि उत्पादों में नए वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकों की मदद से लागत को कम करने का प्रयास किया जा रहा है। धान की तुलना में सब्जी की फसल में, प्रति इकाई क्षेत्र से किसानों को अधिक मुनाफा प्राप्त हो सकता है। वर्तमान समय में प्रचलित सब्जियों की विभिन्न फसल की अवधि के अनुसार, अलग-अलग किस्मों को अपनाकर आय में वृद्धि की जा सकती है। मटर की कुछ प्रचलित किस्म जैसा की काशी उदय और काशी नंदिनी भी किसानों की आय को बढ़ाने में सक्षम साबित हो रही है। सब्जियों के उत्पादन का एक और फायदा यह है कि इनमें धान और दलहनी फसलों की तुलना में खरपतवार और कीट जैसी समस्याएं कम देखने को मिलती है। सब्जियों की नर्सरी को बहुत ही आसानी से लगाया जा सकता है और जलवायुवीय परिवर्तनों के बावजूद अच्छा उत्पादन किया जा सकता है।


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भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR) के अनुसार भारत की जमीन में उगने वाली सब्जियों को दो वर्गों में बांटा जा सकता है, जिनमें धीमी वृद्धि वाली सब्जी की फसल और तेज वृद्धि वाली सब्जियों को शामिल किया जाता है। धीमी वृद्धि वाली फसल जैसे कि बैंगन और मिर्च बेहतर खरपतवार नियंत्रण के बाद अच्छा उत्पादन दे सकती है, वहीं तेजी से बढ़ने वाली सब्जी जैसे भिंडी और गोभी वर्ग की सब्जियां बहुत ही कम समय में बेहतर उत्पादन के साथ ही अच्छा मुनाफा प्रदान कर सकती है।

कैसे करें खरपतवार का बेहतर नियंत्रण ?

सभी प्रकार की सब्जियों में खरपतवार नियंत्रण एक मुख्य समस्या के रूप में देखने को मिलता है। अलग-अलग सब्जियों की बुवाई के 20 से 50 दिनों के मध्य खरपतवार का नियंत्रण करना अनिवार्य होता है। इसके लिए पलवार लगाकर और कुछ खरपतवार-नासी रासायनिक पदार्थों का छिड़काव कर समय-समय पर निराई गुड़ाई कर नियंत्रण किया जाना संभव है। जैविक खाद का इस्तेमाल, उत्पादन में होने वाली लागत को कम करने के अलावा फसल की वृद्धि दर को भी तेज कर देता है।

कैसे करें बेहतर किस्मों का चुनाव ?

किसी भी सब्जी के लिए बेहतर किस्म के बीज का चुनाव करने के दौरान किसान भाइयों को ध्यान रखना चाहिए कि बीज पूरी तरीके से उपचारित किया हुआ हो या फिर अपने खेत में बोने से पहले बेहतर बीज उपचार करके ही इस्तेमाल करें। इसके अलावा किस्म का विपणन अच्छे मूल्य पर किया जाना चाहिए, वर्तमान में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बीज निर्माता कंपनियां अपने द्वारा तैयार किए गए बीज की संपूर्ण जानकारी पैकेट पर उपलब्ध करवाती है। उस पैकेट को पढ़कर भी किसान भाई पता लगा सकते हैं कि यह बीज कौन से रोगों के प्रति सहनशील है और इसके बीज उपचार के दौरान कौन सी प्रक्रिया का पालन किया गया है। इसके अलावा बाजार में बिकने वाले बीज के साथ ही प्रति हेक्टेयर क्षेत्र में होने वाले अनुमानित उत्पादकता की जानकारी भी दी जाती है, इस जानकारी से किसान भाई अपने खेत से होने वाली उत्पादकता का पूर्व अंदाजा लगा सकते हैं। ऐसे ही कुछ बेहतर बीजों की किस्मों में लोबिया सब्जी की किस्में काशी चंदन को शामिल किया जाता है, मटर की किस्म काशी नंदिनी और उदय के अलावा भिंडी की किस्म का काशी चमन कम समय में ही अधिक उत्पादकता उपलब्ध करवाती है।

कैसे निर्धारित करें बीज की बुवाई या नर्सरी में तैयार पौध रोपण का सही समय ?

किसान भाइयों को सब्जी उत्पादन में आने वाली लागत को कम करने के लिए बीज की बुवाई का सही समय चुनना अनिवार्य हो जाता है। समय पर बीज की बुवाई करने से कई प्रकार के रोग और कीटों से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है और फसल की वर्द्धि भी सही तरीके से हो जाती है, जिससे जमीन में उपलब्ध पोषक तत्वों का इस्तेमाल फसल के द्वारा ही कर लिया जाता है और खरपतवार का नियंत्रण आसानी से हो जाता है। कृषि वैज्ञानिकों की राय में मटर की बुवाई नवंबर के शुरुआती सप्ताह में की जानी चाहिए, मिर्च और बैंगन जुलाई के पहले सप्ताह में और टमाटर सितंबर के पहले सप्ताह में बोये जाने चाहिए।

कैसे करें बीज का बेहतर उपचार ?

खेत में अंतिम जुताई से पहले बीज का बेहतर उपचार करना अनिवार्य है, वर्तमान में कई प्रकार के रासायनिक पदार्थ जैसे कि थायो-मेथोक्जम ड्रेसिंग पाउडर से बीज का उपचार करने पर उसमें कीटों का प्रभाव कम होता है और अगले 1 से 2 महीने तक बीज को सुरक्षित रखा जा सकता है।


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कैसे करें सब्जी उत्पादन में आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल ?

वर्तमान में कई वैज्ञानिक अध्ययनों से नई प्रकार की तकनीक सामने आई है, जो कि निम्न प्रकार है :-
  • ट्रैप फसलों (Trap crop) का इस्तेमाल करना :

इन फसलों को 'प्रपंच फसलों' के नाम से भी जाना जाता है।

मुख्यतः इनका इस्तेमाल सब्जी की फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों से बचाने के लिए किया जाता है।

पिछले 10 वर्षों से कृषि क्षेत्र में सक्रिय कृषि वैज्ञानिक 'नीरज सिंह' के अनुसार यदि कोई किसान गोभी की सब्जी उगाना चाहता है, तो गोभी की 25 से 30 पंक्तियों के बाद, अगली दो से तीन पंक्तियों में सरसों का रोपण कर देना चाहिए, जिससे उस समय गोभी की फसल को नुकसान पहुंचाने वाले डायमंडबैक मॉथ और माहूँ जैसे कीट सरसों पर आकर्षित हो जाते हैं, इससे गोभी की फसल को इन कीटों के आक्रमण से बचाया जा सकता है।

इसके अलावा टमाटर की फसल के दौरान गेंदे की फसल का इस्तेमाल भी ट्रैप फसल के रूप में किया जा सकता है।

  • फेरोमोन ट्रैप (pheromone trap) का इस्तेमाल :

इसका इस्तेमाल मुख्यतः सब्जियों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को पकड़ने में किया जाता है।

गोभी और कद्दू की फसलों में लगने वाला कीट 'फल मक्खी' को फेरोमोन ट्रैप की मदद से आसानी से पकड़ा जा सकता है।

इसके अलावा फल छेदक और कई प्रकार के कैटरपिलर के लार्वा को पकड़ने में भी इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है।



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हाल ही में बेंगुलुरू की कृषि क्षेत्र से जुड़ी एक स्टार्टअप कम्पनी के द्वारा तैयार की गई चिपकने वाली स्टिकी ट्रैप (या insect glue trap) को भी बाजार में बेचा जा रहा है, जो आने वाले समय में किसानों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। आशा करते हैं Merikheti.com के द्वारा उपलब्ध करवाई गई यह जानकारी बदलते वक्त के साथ बढ़ती महंगाई और खाद्य उत्पादों की मांग की आपूर्ति सुनिश्चित करने में किसान भाइयों की मदद करने के अलावा उन्हें मुनाफे की राह पर भी ले जाने में भी सहायक होगी।
इस राज्य के पशुपालकों को मिलेगा भूसे पर 50 फीसदी सब्सिडी, पशु आहार पर भी मिलेगा अब ज्यादा अनुदान

इस राज्य के पशुपालकों को मिलेगा भूसे पर 50 फीसदी सब्सिडी, पशु आहार पर भी मिलेगा अब ज्यादा अनुदान

उत्तराखंड सरकार अपने राज्य के किसानों का ख्याल रखने में कोई कसर नही छोड़ रही है। राज्य सरकार का प्रयास है, कि राज्य में होने वाली खेती को फायदे का सौदा बनाया जाए तथा जल्द से जल्द किसानों की आय दोगुनी की जाए, ताकि उत्तराखंड के गावों से किसानों और लोगों का पलायन रोका जा सके। इसी कड़ी में उत्तराखंड सरकार नित नई घोषणाएं करती रहती हैं, ताकि किसान अपने आपको इस पर्वतीय राज्य में मजबूती के साथ खड़ा रख पाए। अभी हाल ही में उत्तराखंड सरकार ने पशुपालकों को राहत देते हुए घोषणा की है, कि सरकार की ओर से भूसे की खरीद पर 50 प्रतिशत की सब्सिडी दी जाएगी। सरकार ने यह निर्णय भूसे के बढ़ते हुए दामों को लेकर लिया है। वर्तमान में राज्य में भूसे का दाम 1600 रुपये प्रति क्विंटल है। जिस पर सरकार 800 रुपये प्रति क्विंटल की सब्सिडी देने जा रही है। इस हिसाब से अब राज्य के किसानों और पशुपालकों को 1 क्विंटल भूसे की खरीद पर मात्र 800 रुपये ही चुकाने होंगे। [embed]https://www.youtube.com/watch?v=wdZnodFWSB8&t=17s[/embed] इसके साथ ही सरकार ने पशु आहार पर मिलने वाले अनुदान में भी बढ़ोत्तरी की है। जहां पहले पशु आहार पर 2 रुपये प्रति किलो की सब्सिडी दी जाती थी। उसे बढ़ाकर सरकार ने राज्य के मैदानी क्षेत्रों के लिए 4 रुपये प्रति किलो कर दिया गया है। इसी के साथ अब राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों में पशु आहार पर मिलने वाली सब्सिडी को बढ़ाकर 6 रुपये प्रति किलो कर दिया गया है।


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सरकारी अधिकारियों ने नोटिफिकेशन के माध्यम से बताया है, कि सहकारिता विभाग की तरह ही अब दुग्ध विकास विभाग के माध्यम से भी पशुपालकों को साइलेज पर 75 फीसद की सब्सिडी प्रदान की जाएगी। अगर सरकारी आंकड़ों की बात करें तो प्रदेश में 8 लाख से ज्यादा पशुपालक हैं। जो सीधे तौर पर पशुपालन के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। इनमें से लगभग 52 हजार दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियों से जुड़े हुए हैं। इन सभी की पहचान करके भूसे पर तथा पशु आहार पर सब्सिडी प्रदान की जाएगी। इस योजना को कैबिनेट की तरफ से मंजूरी मिल गई है। राज्य सरकार का अनुमान है, कि सरकार के इन फैसलों से राज्य के किसानों और दुग्ध उत्पादकों को फायदा होगा। जिससे उनकी आमदनी में भी बढ़ोत्तरी हो सकेगी। जो राज्य में पशुपालन को बड़े स्तर पर बढ़ाने में सहायक होगा। अगर किसानों की खेती और पशुपालन के माध्यम से आमदनी बढ़ती है, तो यह राज्य में लगातार हो रहे पलायन को रोकने में मददगार साबित हो सकता है।
प्लायमाउथ रॉक मुर्गी करेगी मालामाल, बस करना होगा ये काम

प्लायमाउथ रॉक मुर्गी करेगी मालामाल, बस करना होगा ये काम

प्लायमाउथ रॉक मुर्गी से मालामाल भला कोई कैसे हो सकता है, इस बारे में आप भी जरूर सोच रहे होंगे. लेकिन यह सच हो सकता है. जी हां अगर आप किसान हैं, और मुर्गी पालन का काम करते हैं, तो यह खबर आपके काफी काम आने वाली है. दरअसल किसान अपनी खेती के साथ पोल्ट्री फार्म का काम बखूबी कर रहे हैं. इस काम से उन्हें मोटी कमाई भी हो रही है. हालांकि ना सिर्फ किसान बल्कि अन्य लोग भी चिकन और अंडे का बिजनेस कर रहे हैं. जो उनेक परिवार के आय का स्रोत भी है. इस बिजनेस में ज्यादा इन्वेस्ट करने की जरूरत नहीं होती. यही इस बिजनेस की सबसे खास बात है. इस बिजनेस को शुरू करने के लिए सरकार भी किसानों को सब्सिडी की देती है. अब अगर आप भी अपनी आमदनी को दोगुना करना चाहते हैं, और मालामाल होना चाहते हैं, तो पोल्ट्री फार्म को शुरू करने से पहले इस खास नस्ल की मुर्गी के बारे में जान लें.

प्लायमाउथ रॉक मुर्गी

किसान अगर अपने पोल्ट्री फार्म में प्लायमाउथ रॉक नस्ल की मुर्गी पालने लग जाएं, तो वो कम ही समय में ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं. देसी मुर्गियों के मुकाबले प्लायमाउथ रॉक मुर्गी ज्यादा तंदरुस्त होती है, और बीमार भी कम पड़ती है. इसके अलावा यह मुर्गी अंडे भी ज्यादा देती है. अब ऐसे में किसान इसका चिकन और अंडे दोनों बेचकर ज्यादा कमाई करने में सक्षम हो सकते हैं.

मार्केट में ज्यादा डिमांड

प्लायमाउथ रॉक एक अमेरिकी नस्ल की मुर्गी होती है. लेकिन मार्केट में इसकी ज्यादा डिमांड की वजह से यह अब भारत में पाली जाने लगी है. जिस वजह से इसके चिकन के रेट भी मार्केट में ज्यादा हैं. रॉक बर्रेड रॉक के नाम से भारत में जानी जाने वाली यह मुर्गी हेल्थ के लिए काफी अच्छी होती है. इसका मीट भी हेल्थ के लिए काफी अच्छा होता है. इन्हीं खूबियों की वजह से प्लायमाउथ रॉक मुर्गी की डिमांड भारत में बढ़ रही है. ये भी देखें: कड़कनाथ पालें, लाखों में खेलें

ठंड में चाहिए देखभाल

प्लायमाउथ रॉक मुर्गी का शरीर देसी मुर्गी के शरीर के मुकाबले काफी बड़ा होता है. इसका वजन आमतौर पर 3-4kg तक होता है. गहरे भूरे रंग के अंडे देने वाली प्लायमाउथ रॉक मुर्गी हर साल 200-250 तक अंडे दे सकती है. इस मुर्गी के रंगों की बात करें तो यह बफ, वाइट, ब्लू सहित कई रंगों में आती है. इसका स्वभाव काफी शांत और मिलनसार है. प्लायमाउथ रॉक हमेशा घास में रहना पसंद करती है. बीस हफ्ते की उम्र में ही अंडे देने की क्षमता रखने वाली प्लायमाउथ रॉक मुर्गी हर हफ्ते चार से पांच अंडे दे सकती है. वैसे तो यह मुर्गी हर तरह के जलवायु में रह लेती है, लेकिन सर्दियों में इसे थोड़ी बहुत देखभाल की जरूरत होती है.
विश्व दलहन दिवस, जानें दालों से जुड़ी खास बातें

विश्व दलहन दिवस, जानें दालों से जुड़ी खास बातें

हर साल आज के दिन यानि की 10 फरवरी को विश्व दलहन दिवस मनाया जाता है. इस खास दिन को मनाने के पीछे दालों के पोषण और पर्यावरण से जुड़े लाभ छुपे हुए हैं. पर्यावरण और पोषण से जुड़े फायदों के बारे में जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से हर साल 10 फरवरी को विश्व दलहन दिवस को मनाया जाता है. जैसा की हम सब जानते हैं कि, दालों को फलियां भी कहा जाता है. पूरे विश्व में मिलने वाले दाल एक मात्र ऐसा खाद्य पदार्थ है, जिसका उत्पादन लगभग हर देश में किया जाता है. साल 2019 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पूरे विश्व में दालों को लेकर जागरूकता फैलाने का फैसला लिया और इसकी पहुंच बढ़ाने के लिए आज का खास दिन दालों पर समर्पित कर दिया.

क्या है थीम?

कृषि और पर्यावरण के लिए दालें काफी फायदेमंद होती हैं. साल 2023 में इस बार विश्व दलहन दिवस की थीम ‘एक सतत भविष्य के लिए दलहन’ के रूप में चुनी गयी है. इस साल इस खास दिन का जश्न मानाने के लिए मिट्टी की उत्पादकता में सुधार करने और कृषि प्रणालियों के लचीलेपन को बढ़ाने के अलावा पानी के कमी वाली जगहों में रहा रहे किसानों को अच्छी लाइफ देने के लिए दालों के योगदान के बारे में बताया जा रहा है. ये भी देखें:
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इस दिन से जुड़ा इतिहास, विश्व दलहन दिवस क्यों मनाया जाता है

  • साल 2013 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दालों के दामों को मान्यता दी.
  • साल 2016 में अंतराष्ट्रीय दलहन वर्ष के रूप में अपनाया गया.
  • एफएओ ने दालों की पौष्टिकता और पर्यावरण से जुड़े लाभों के बारे में सार्वजिनक रूप से जागरूकता बढ़ाई.
  • बुर्किना फासो और लैंडलॉक देश ने विशव दलहन दिवस को मनाना जारी रखने का प्रस्ताव रखा.
  • साल 2019 में संयुक्त महासभा ने 10 फरवरी को विश्व दलहन दिवस के रूप में समर्पित किया.

दालों से जुड़ा महत्व

  • दाल को प्रोटीन और जरूरी तत्वों से भरपूर अच्छा स्रोत माना जाता है.
  • दाल में कम फैट और ज्यादा फाइबर होता है.
  • कोलेस्ट्रोल कम करने और ब्लड शुगर को कंट्रोल करने में दाल मददगार है.
  • मोटापे से निपटने में भी दाल मददगार होती है.
  • डायबिटीज और दिल की बिमारी से बचने में भी दाल मददगार हो सकती है.
दालें किसानों की आय के लिए महत्वपूर्ण संसाधन है. जिसे वह बेच भी सकता है और खा भी सकता है. दालों की खेती करना बेहद आसान है. इन्हें फलने और फूलने के लिए ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती. इसके अलावा अगर कोई आपदा आ जाए तो किसान इससे बेहतर तरीके से निपट सकते हैं.
जानें मिर्च की खेती में कितनी लागत में किसान कितना मुनाफा कमा सकते हैं

जानें मिर्च की खेती में कितनी लागत में किसान कितना मुनाफा कमा सकते हैं

भारत संपूर्ण वैश्विक खपत का अकेले 36 प्रतिशत मिर्ची का उत्पादन करता है। यह मसालों समेत मिर्च का भी निर्यात करता है। भारतीय लोग तीखा खाना अधिक पसंद करते हैं। सब्जी से लेकर दाल तक में तीखापन लाने के लिए मिर्च-मसालों का तड़का लगाया जाता है। यहां तक कि बाजार में मिलने वाले चिप्स और कुरकुरे भी तीखे ही होते हैं। विशेष बात यह है, कि हरी और लाल मिर्च का अचार भी निर्मित किया जाता है, जिसे लोग बड़े ही स्वाद से खाते हैं। ऐसी स्थिति में हम यह कह सकते हैं, कि बाकी फसलों की भांति किसान यदि मिर्च की खेती करते हैं, तब वह बेहतरीन आमदनी कर सकते हैं।

अकेला भारत वैश्विक खपत का 36 फीसद मिर्च उत्पादन करता है

बतादें कि मुख्य बात यह है, कि भारत पूरी दुनिया की खपत का अकेले 36 प्रतिशत मिर्ची का उत्पादन करता है। यह मसालों समेत मिर्च का भी निर्यात करता है। भारत में तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश समेत कई राज्यों में
मिर्च की खेती की जाती है। एकमात्र आंध्र प्रदेश की मिर्च के कुल उत्पादन में 57 प्रतिशत भागीदारी है। साथ ही, विभिन्न राज्यों में सरकारें मिर्च की खेती हेतु अनुदान भी प्रदान करती हैं। हालाँकि, बाजार में हरी मिर्च का भाव सदैव 60 रुपये से लेकर 80 रुपये प्रतिकिलो तक रहता है।

एक हेक्टेयर जमीन पर मिर्च की खेती करने पर कितने किलो बीज की जरूरत पड़ेगी

भारत में हरी एवं लाल मिर्च दोनों की पैदावार की जाती है। इन दोनों मिर्चों की खेती किसी भी प्रकार की मृदा में की जा सकती है। यदि किसान भाई एक हेक्टेयर जमीन में मिर्च का उत्पादन करने की योजना बना रहे हैं, तो उसके लिए उनको सर्वप्रथम नर्सरी तैयार करनी पड़ेगी। नर्सरी तैयार करने के लिए लगभग 8 से 10 किलो मिर्च की जरुरत पड़ेगी। 10 किलो मिर्च के बीज खरीदने के लिए आपका 20 से 25 हजार रुपये का खर्च हो जाएगा। अगर आप हाइब्रिड बीज खरीद रहे हैं, तो आपको इसके लिए 40 हजार रुपये का खर्चा करना पड़ेगा। उसके बाद आप नर्सरी के अंदर बीज की बुवाई भी कर सकते हैं। एक माह के उपरांत नर्सरी में मिर्च के पौधे पूरी तरह तैयार हो जाएंगे। इसके उपरांत आप पहले से तैयार खेत में मिर्च की बुवाई कर सकते हैं।

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एक हेक्टेयर में मिर्च उत्पादन के दौरान कितना खर्चा आता है

हालांकि, मिर्च की रोपाई करने से पूर्व सबसे पहले खेत को बेहतर ढ़ंग से तैयार करना पड़ेगा। खेत में उर्वरक के तौर पर गोबर को इस्तेमाल करना अधिक अच्छा रहेगा। एक हेक्टेयर जमीन में मिर्च का उत्पादन करने पर 3 लाख रुपये का खर्चा आएगा। परंतु, कुछ माह के उपरांत आप इससे 300 क्विंटल तक मिर्च की पैदावार उठा सकते हैं। अगर आप 50 रुपये के हिसाब से भी 300 क्विंटल मिर्च की बिक्री करते हैं, तो आपको करीब 15 लाख की आमदनी होगी।
भारत सरकार शून्य बजट प्राकृतिक खेती के लिए क्यों और किस तरह से बढ़ावा दे रही है

भारत सरकार शून्य बजट प्राकृतिक खेती के लिए क्यों और किस तरह से बढ़ावा दे रही है

भारत के अंदर शून्य बजट प्राकृतिक खेती (जेडबीएनएफ) टिकाऊ एवं फायदेमंद दोनों होने की क्षमता रखती है। हालांकि, बहुत सारे कारक इसकी सफलता और लाभप्रदता को प्रभावित करते हैं। लागत-मुनाफा अनुपात के मुताबिक, यह दीर्घकाल में तभी फायदेमंद हो सकता है। जब एक स्थापित मूल्य श्रृंखला के साथ बड़े स्तर पर किया जाए और लघु स्तरीय किसानों के लिए इससे उबरना कठिन साबित होगा।

ZBNF के तहत स्थिरता

ZBNF जैविक कृषि पद्धतियों, मृदा संरक्षण एवं जल प्रबंधन पर विशेष ध्यान केंद्रित करता है, जो दीर्घकालिक स्थिरता में सहयोग प्रदान करता है। रासायनिक आदानों को खत्म करके, ZBNF मृदा के स्वास्थ्य, जैव विविधता एवं पारिस्थितिक संतुलन को प्रोत्साहन देता है। यह बाहरी इनपुट पर निर्भरता को कम करता है, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करता है एवं कृषि प्रणाली में भी काफी सुधार करता है।

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ZBNF के अंतर्गत लागत में बचत

ZBNF के मुख्य सिद्धांतों में से एक बाहरी इनपुट को समाप्त करना और लागत को कम करना है। स्थानीय तौर पर उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल करके और प्राकृतिक कृषि तकनीकों को अपनाकर, किसान रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों एवं बीजों के खर्च को कम अथवा समाप्त कर सकते हैं। इससे वक्त के साथ महत्वपूर्ण लागत बचत हो सकती है, जिससे कृषि कार्यों की लाभप्रदता बढ़ सकती है।

मृदा स्वास्थ्य एवं पैदावार में सुधार

ZBNF प्रथाएं मल्चिंग, कम्पोस्टिंग एवं इंटरक्रॉपिंग जैसी तकनीकों के माध्यम से मृदा की उर्वरता में सुधार लाने पर ध्यान केंद्रित करती हैं। ये विधियाँ मिट्टी की संरचना, जल-धारण क्षमता एवं पोषक तत्वों की विघमानता को बढ़ाती हैं, जिससे फसल की पैदावार में सुधार होता है। बढ़ी हुई उत्पादकता एवं लाभप्रदता पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकती है। विशेष कर यदि किसान उन बाजारों तक पहुंच सकते हैं, जो जैविक पैदावार को पहचानते हैं और प्रीमियम का समय से भुगतान करते हैं।

ZBNF के अंतर्गत स्वास्थ्य जोखिम और इनपुट निर्भरता में कमी

रासायनिक कीटनाशकों एवं उर्वरकों को समाप्त करके, ZBNF कृषकों एवं उपभोक्ताओं के लिए उनके इस्तेमाल से जुड़े स्वास्थ्य जोखिमों को कम करता है। यह महंगे बाहरी इनपुट पर निर्भरता को भी काफी कम करता है, जिससे खेती का काम ज्यादा आत्मनिर्भर और मूल्य में उतार-चढ़ाव के प्रति सहज हो जाता है।

ZBNF के अंतर्गत जैविक उपज की बाजार मांग

भारत और विश्व स्तर पर जैविक एवं रसायन-मुक्त उत्पादों की मांग बढ़ती जा रही है। ZBNF इस बाजार प्रवृत्ति के साथ संरेखित होता है, जिससे किसानों को प्रीमियम बाजारों में प्रवेश करने और अपनी जैविक उपज के लिए उच्च मूल्य प्राप्त करने का अवसर प्राप्त होता है। हालाँकि, इन बाजारों तक पहुँचना एवं प्रभावी ढंग से स्थिरता कायम करना एक चुनौती हो सकती है, और लाभप्रदता सुनिश्चित करने के लिए बाजार संपर्क विकसित करने की जरूरत है।

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ZBNF के अंतर्गत ज्ञान और क्षमता निर्माण

ZBNF के सफल कार्यान्वयन के लिए किसानों को पर्याप्त ज्ञान और प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। आवश्यक प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और ज्ञान-साझाकरण मंच प्रदान करने के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम, सरकारी सहायता और कृषि संस्थानों और गैर सरकारी संगठनों की भागीदारी महत्वपूर्ण है। ZBNF प्रथाओं में सूचना, अनुसंधान और नवाचारों तक पहुंच स्थिरता और लाभप्रदता को और बढ़ा सकती है।

भारत सरकार शून्य बजट प्राकृतिक खेती को इस तरह से प्रोत्साहन दे रही है

सरकार प्राकृतिक खेती समेत पारंपरिक स्वदेशी प्रथाओं को प्रोत्साहन देने के लिए परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) की एक उप-योजना के रूप में 2020-21 के दौरान चलाई गई भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (बीपीकेपी) के जरिए प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन दे रही है। यह योजना विशेष रूप से समस्त सिंथेटिक रासायनिक आदानों के बहिष्कार पर बल देती है। साथ ही, बायोमास मल्चिंग, गाय के गोबर-मूत्र फॉर्मूलेशन के इस्तेमाल और अन्य पौधे-आधारित तैयारियों पर विशेष जोर देकर खेत पर बायोमास रीसाइक्लिंग को प्रोत्साहन देती है। बीपीकेपी के अंतर्गत क्लस्टर निर्माण, क्षमता निर्माण एवं प्रशिक्षित कर्मियों द्वारा निरंतर सहायता, प्रमाणन एवं अवशेष विश्लेषण के लिए 3 सालों के लिए 12,200 रुपये प्रति हेक्टेयर की वित्तीय सहायता मुहैय्या कराई जाती है।

प्राकृतिक खेती के तहत 4.09 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल को कवर किया गया है

कृषि मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, प्राकृतिक खेती के अंतर्गत 4.09 लाख हेक्टेयर रकबे को कवर किया गया है। आपकी जानकारी के लिए बतादें कि देश भर के 8 राज्यों को कुल 4,980.99 लाख रुपये का फंड जारी किया गया है। जबकि ZBNF में टिकाऊ और लाभदायक होने की क्षमता है, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि परिणाम स्थानीय कृषि-जलवायु स्थितियों, फसल चयन, बाजार की गतिशीलता, किसानों के कौशल और संसाधनों तक पहुंच जैसे अहम कारकों के आधार पर अलग हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त, ZBNF में परिवर्तन के लिए प्रारंभिक निवेश, मिट्टी के स्वास्थ्य की बहाली के लिए समय और किसानों के लिए सीखने की स्थिति की जरूरत हो सकती है। हालाँकि, उचित कार्यान्वयन, समर्थन एवं बाजार संबंधों के साथ, ZBNF भारत में एक टिकाऊ एवं लाभदायक कृषि मॉडल प्रस्तुत कर सकता है।
यूपी सरकार द्वारा सोलर पंप पर पहले आओ पहले पाओ के आधार पर सोलर पंप पर भारी छूट

यूपी सरकार द्वारा सोलर पंप पर पहले आओ पहले पाओ के आधार पर सोलर पंप पर भारी छूट

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी द्वारा सोलर पंप योजना उत्तर प्रदेश (Solar Pump Scheme UP 2024) का आरम्भ किया गया है| यह योजना मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के किसानो के हित में आरम्भ की गयी है | यह किसानो के लिए एक बहुत ही लाभकारी योजनाओं में से एक है | वर्तमान समय में पेट्रोल और डीजल के दाम इतने ज्यादा अधिक बढ़ चुके है कि किसान खेतों में पानी डीजल इंजिन से लगाकर लाभ नहीं प्राप्त कर सकता है, और खेती में सिर्फ पानी देने की वजह से बहुत अधिक खर्च आ जाता है | इस समस्या से किसान बहुत अधिक परेशान रहते है| 


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इसके अलावा खेतों में पानी के लिए कई गांवों में अभी तक बिजली की समस्या बनी हुई है | जहाँ ट्यूबेल की लिए बिजली की समस्या अभी भी बनी हुई है| फसल को समय से पानी देने के लिए और किसानों को इसका कोई खर्च न उठाना पड़ें इसके लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने सोलर पंप योजना की शुरुआत करके नई सौगात दी है | सोलर पम्प योजना का लाभ प्राप्त कर किसानो को सिंचाई व्यवस्था में लाभ होगा इससे किसानो को अधिक खर्च की जरूरत नहीं होगी | उत्तर प्रदेश के 10,000 गावो में इस सोलर पंप को लगाने की योजना बनायीं गयी है | जिसमे एक सोलर पंप के जरिये कई किसानो की समस्याओ का समाधान होगा | यदि आप भी उत्तर प्रदेश में रहते है, और इस योजना का लाभ प्राप्त करना चाहते है, तो इस पोस्ट में आपको मुख्यमंत्री सोलर पंप योजना 2024 उत्तर प्रदेश, ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन, UP Solar Pump Scheme से जुड़ी सभी महत्वपूर्ण जानकारियों के बारे में बताया जा रहा है |